गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

कोरोनाकाल पर एक दिलचस्प किताब


किसी नये लेखक की पहली किताब न सिर्फ चकित करे, बल्कि कुछ इस तरह बांध ले कि आप उसे पूरा पढने के लिए विकल हो जाएं, ऐसा बहुत कम होता है। ख़ासतौर से ऐसी किताब के लिए, जो न कविता हो, न उपन्यास, न निबंध हो, न यात्रावृतांत, लेकिन जिसमें साहित्य की कई विधाओं का स्वाद और अपने समय के जनजीवन की वेदना, प्रेम और मनुष्यता की उच्च भावभूमि और जीवनयात्रा का कठिन संघर्ष हो, जीवन का एक ऐसा मिश्रण जिसमें अपने समय का सत शामिल हो। मेरा आशय नये लेखक मयंक पाण्डेय की किताब ‘कोरोनाकाल की पचास सच्ची घटनाएंरू पलायन पीड़ा प्रेरणा‘ से है। किसी लेखक की पहली किताब से पहलीबार इस तरह प्रभावित हुआ हूं। कोरोना के भयावह समय पर कई लेखकों ने कविताएं लिखीं हैं। मैंने ख़ुद, पृथ्वी पर काली छाया, लंबी रात, सोनू सूद, शीर्षक से तीन लंबी कविताएं लिखी हैं। दिल्ली और मुंबई के महाकवियों ने भी कुछेक और देशभर के कवियों ने असंख्य छोटी कविताएं लिखी हैं, लेकिन कोनोनाकाल का दस्तावेज, इन कविताओं को नहीं कह सकता। दस्तावेजी लेखन मयंक की इस किताब में है। शायद ही कोई प्रतिनिधि घटना हो, जिस पर मयंक की नज़र न गयी हो, हृदय द्रवित न हुआ हो, लेखक की आंख से आंसू न टपका हो, शायद ही कोई मज़दूर या दुखी जन हो, जिसके कंधे पर मयंक ने हाथ न रखा हो। इस किताब को एक नज़र देखने के बाद पढ़ने के लिए उठाते ही मैंने कहा था कि नये लेखक की पहली किताब पढ़ रहा हूँ, जो उपन्यास नहीं है, लेकिन उपन्यास से कम भी नहीं है। कोरोना काल की पचास सच्ची घटनाओं से हिन्दी में ऐसा भी गद्य संभव है। जिसमें कथारस भी है, ज्ञान और सूचनाओं का संसार भी और अपने समय की दस्तावेजी पत्रकारिता भी। कहानियों और चरित्रों की एक सुदीर्घ शृंखला है। जीवन और संघर्ष की विराट गाथा। आख़िर उपन्यास है क्या? जीवन की महागाथा या कुछ और? इस किताब ने बाँध लिया है। पढ़ने की गति की समस्या अपनी जगह, लेकिन लंबे समय के बाद कोई इस तरह की किताब पढ़ रहा हूँ। पूरी किताब पढ़े बिना इसके बारे में कुछ कहना इस उम्र में मुश्किल नहीं है, लेकिन कोई किताब दिल को छू ले, तो उसे पूरा पढ़ना ही चाहिए। पढ़ने के बाद यह कहना बनता है कि वाकई कोनोनाकाल पर लिखी गयी यह एक दिलचस्प किताब है। जिस किसी की दिलचस्पी कोनोना समय को जानने की हो उसे इस किताब को ज़रूर पढ़ना चाहिए। यही नहीं, जिस कथाकार को कोरोनाकाल पर कोई उपन्यास या कहानी लिखनी हो, उसे भी एक बार इस किताब से ज़रूर गुज़रना चाहिए।

लेखक अपनी किताब की शुरुआत ही दो प्रेमियों की मुश्किल से करता है। अशोक और नमिता ने अंतरजातीय प्रेमविवाह किया था। लाकडाउन की विपरीत परिस्थितियां थीं। अशोक चेन्नई में काम करता था। पत्नी और प्रिया नमिता संग वहीं रहता था। दो छोटे बच्चे उड़ीसा में दादा-दादी के पास रहते थे। नमिता उनसे मिलने के लिए विकल थी। पब्लिक यातायात बंद। ऐसे में 1100 किलोमीटर की कठिन यात्रा साइकिल के कैरियर पर अपनी पत्नी को बैठाकर अशोक ने की। यह एक पिता का कर्तव्य ही नहीं, एक प्रेमी का अपनी पत्नी के लिए अक्षुण्ण प्रेम था, जिसने उसे मुश्किल रास्तों पर भी पैदल नहीं चलने दिया। यह ‘‘ अशोक का नमिता के प्रति निश्छल प्रेम था, जो स्वयं को मिटाकर भी पत्नी को सुख देना चाहता था। पहाड़ी रास्तों पर छाले तो अशोक के पैरों में पड़े थ, पर उनका दर्द नमिता ने भी महसूस किया था। साइकिल के पैडल मारते-मारते और ब्रेक लगाते-लगाते हाथ-पैर तो अशोक के सूजे थे, पर उसकी टीस और चुभन तो नमिता ने भी महसूस की थी।’’ मयंक ने स्त्रीजीवन और अपनी पत्नियों के लिए लाकडाउन जैसी विपरीत परिस्थितियों में की गयी पुरुषों की बहादुरी की अनेक घटनाओं की ओर ध्यान खींचा है। गहने बेनकर मोटर साइकिल खरीदना और उससे लंबी यात्रा करके गांव पहुंचना। मयंक पाण्डेय के भीतर का लेखक सिर्फ इसे एक धटना या खबर के रूप में नहीं लेता है, बल्कि स्त्री के मनोविज्ञान और स्वभाव का भी विश्लेषण करता है। मयंक ने बताया है कि भारतीय जीवन में गहने खासतौर से सोने का क्या महत्व है और उसे कैसे मुश्किल दिनों में बेचकर स्त्री अपने आभूषण प्रेम को पति और परिवार के प्रेम के सामने सरलता से तज देती है। यहां पुणे में काम करने वाले सात मज़दूरों की पत्नियां, परिवार और गांव पहुंचने के एक बड़े उद्देश्य के लिए अपने जेवर बेचने के लिए तुरत अपने पतियों को सौंप देती हैं। लाकडाउन जैसे अत्यंत मुश्किल समय में मज़दूरों की इन पत्नियों का यह त्याग प्रेमचंद के गबन की आभूषणप्रिय जालपा के स्वाधीनता संघर्ष के लिए किये गये आभूषण के त्याग से कम नहीं है। निश्चय ही प्रेमचंद ने जालपा के बहाने पहलीबार एक नयी स्त्री के चरित्र को गढ़ा है। लाकडाउन में ऐसी स्त्रियां असंख्य हैं, जो अपने पतियों के साथ विपदा का सामना करने के लिए डटकर खड़ी होती हैं। सच तो यह कि इस मुश्किल समय ने परिवार को ही नहीं, समाज को भी एक नयी चेतना से सम्पृक्त किया है। मनुष्य के भीतर नये मनुष्य का उदय होता है, जो पहले से अधिक मानवीय और उदार है, संकट के समय में छोटी से छोटी आर्थिक स्थिति का मनुष्य भी मसीहा बन जाता है। मदद के लिए अपनी सीमा भूलकर सहायता करता है। पैदल या साइकिल और ठेले वगैरह पर अपने परिवाी के साथ मुश्किल यात्रा करने वाले लोगों पर फैशन के रूप में लिखी गयीं कविताएं, भारतीयजन की पीड़ा और संवेदना को उस तरह नहीं व्यक्त कर पाती हैं, जैसा इस किताब के पन्नों पर जगह-जगह दर्द की नदी बनकर बह रही है। इस विपदा की घड़ी में जहां एक मां पैसे न होने की वजह से अपने बेटे का शव लेने से इंकार करती है कि उसका दाहसंस्कार कैसे करेगी, वहीं स्वयंसेवी संगठन उस विवश मों का हाथ थाम लेते हैं। ऐसे अनेक संगठन सामने आते हैं। छोटे-छोटे संगठन तो आगे आते ही हैं, टाटा समूह जैसा बड़ा धराना डेढ़ हजार करोड़ देश के लिए तुरत देता है। और भी औद्योगिक घराने और संस्थाएं, फिल्म कलाकार सामने आते हैं। इन फिल्म कलाकारों में निश्चय ही सोनू सूद की भूमिका सराहनीय है। यह खलनायक, एक नायक बनकर हमारे सामने आता है। मयंक ने विस्तार से सोनू सूद के प्रेरक चरित्र पर प्रकाश डाला है। मयंक ने अपनी किताब में मज़दूरों के पलायन को, उसकी पीड़ा को और इस मुश्किल में उनकी मदद के लिए जगह-जगह जो प्रेरक चरित्र उभरकर हमारे सामने आए हैं, उन सबको प्रामाणिकता और सहृदयता के साथ अपनी इस बेशकीमती किताब में चित्रित किया है। कोरोना समय में प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, पैरा मेडिकल स्टाफ, पुलिस अधिकारी और कर्मचारी, कई स्वयंसेवी संगठन, देवदूत की तरह उभरकर हमारे सामने आए। मयंक ने पैडवूमन अमनप्रीत पासी, प्रियल भारद्वाज, रूमा भार्गव, मेधा भार्गव, वैभव जैन और विकास खन्ना जैसे सचमुच के चरित्रों के ज़रिए इस कोरोना कथा को भावप्रवण, मार्मिक और बहुत प्रेरक बना दिया है। एक तरफ़ महान दुख है, तो दूसरी तरफ़ उस महान दुख से लड़ने का महान जज़्बा। यह सब शायद किसी काल्पनिक कहानी या उपन्यास में संभव नहीं हो पाता। कोरोनाकाल पर लिखी गयी इस किताब में ही यह सब संभव है।  
  मयंक ने कोरोनाकाल की मुश्किल को भारतीय समाज की मुश्किल के रूप में भी देखा है। मयंक एक ओर संघर्ष को रेखांकित किया है, तो दूसरी ओर कोरोना के खिलाफ चल रही जंग को कमज़ोर करने वाले तत्वों की भी ख़बर ली है। मघ्यप्रदेश में कैसे एक बाबा तंत्र-मंत्र के सहारे कोरोना ठीक करने का दावा करता है और इस तरह तमाम लोगों को कोरोना बांटता है। ऐसी मुश्किलों पर भी लेखक का घ्यान है, लेकिन लेखक उस विशालजन की पीड़ा से घ्यान नहीं हटाता है, जिनके पास संघर्ष के बीच विश्वास है, जीने और अपनों के पास पहुंचने की अदम्य इच्छा है। अपनी इन्हीं ख़ूबियों की वजह से भारतीयजन इस बड़ी विपदा से लड़ पाता है। इस यात्रा में कैसे कोई गर्भवती मां सड़क पर बच्चे को जन्म देती है और मदद के लिए कई हाथ बढ़ जाते हैं। कैसे एक भिखारी अपने बिना आंख के दो भिखारी साथियों को लंबी यात्रा के बाद अपने गांव-जवार लेकर पहुंचता है, कैसे कोई किशोरी अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठाकर लंबी यात्रा करती है, इस तरह के साहस और जज्बे की असंख्य धटनाएं इस दौरान धटी हैं, लेखक ने उनमें से कोई पचास धटनाओं को इस किताब की यात्रा के लिए चुना है। ज़ाहिर है, लेखक ने अपनी किताब को अपने समय और अपने आसपास के जीवन को समग्रता में देखा है। पूरा देश कोरोनाकाल की इस कथा में सिमट आया है। मयंक ने अपने आत्मकथ्य में ही इस भारतीयजन की धरवापसी को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा है। यह गांव से शहर का पलायन नहीं है। शहर से गांव और मूल की ओर वापसी का पलायन है। ज़ाहिर है, कोई भी पलायन हो उसके साथ दर्द का एक सैलाब भी चलता चला जाता है। लेखक को भारत विभाजन के वक़्त जो विस्थापन होता है, उसकी याद आती है, उसके दर्द को इस पलायन से जोड़कर देखता है। लेखक कहता है, ‘ इतिहास गवाह है कि विस्थापन और पलायन ने हमेशा एक नये वर्ग को जन्म दिया है। चलायमान संधर्ष ने समूह में चल रहे लोगों के व्यक्तित्व और व्यवहार दोनों में सकारात्मक बदलाव किये हैं। सड़को पर संधर्षरत परिवार, वर्ग या व्यक्ति इस दौरान ज़िंदगी के यथार्थ, परिश्रम के महत्व और रिश्तों की महत्ता को बखूबी समझ लेता है। ये उसके व्यक्तित्व में ऐसे बदलाव लाते हैं, जिसके दूरगामी परिणाम होते हैं। पूरी किताब पढ़ना एक समय, एक अनुभव से गुज़रना ही नहीं है, हिन्दी में अपने तरह की एक बेहद दिलचस्प किताब से भी गुज़रना है। हिन्दी में सिर्फ कविता-कहानी की ही नहीं, ऐसी किताबों की ज़रूरत है, जो पाठक की संवेदना को झंकृत करें, उसके मर्म को छुएं और उसके भीतर किताबों को पढ़ने की दिलचस्पी पैदा करें।
- गणेश पाण्डेय

शनिवार, 18 जुलाई 2020

महेश अश्क की गजलें

एक/

गर सफर में निकल नहीं आते
हम जहाँ थे वहीं प’ रह जाते।
आहटें थीं, गुजर गईं छू के
ख्वाब होते तो आँख में आते।
हम ही खुद अपनी हद बनाते हैं
और उससे निकल नहीं पाते।
रास्ता था, तो धूल भी उड़ती
हम नहीं आते, दूसरे आते।
आप तो कह के बढ़ गए आगे
रह गए हम समझते-समझाते।
हम थे इक फासले प’ सूरज से
साथ होते तो डूब ही जाते।
इनकी-उनकी तो सुनते फिरते हैं
काश! हम अपनी कुछ खबर पाते...।

दो/

नहीं था, तो यही पैसा नहीं था
नहीं तो आदमी में क्या नहीं था।
परिंदों के परों भर आस्मां से
मेरा सपना अधिक ऊँचा नहीं था।
यहाँ हर चीज वह हे, जो नहीं हे
कभी पहले भी ऐसा था-? नहीं था।
हसद से धूप काली थी तो क्यों थी
दिया सूरज से तो जलता नहीं था।
पर इम्कां के झुलसते जा रहे थे
कहीं भी दूर तक साया नहीं था।
हुआ यह था कि उग आया था हम में
मगर जंगल अभी बदला नहीं था।
जमीनों-आस्मां की वुस्अर्तों में-
अटाए से भी मैं अटता नहीं था।
हमारे बीच चाहे और जो था
मगर इतना तो सन्नाटा नहीं था।
मुझे सब चाहते थे सस्ते-दामों
मुझे बिकने का फन आता नहीं था।

तीन/

मस्खरे तलवार लेकर आ गए
हम हँसे ही थे कि धोखा खा गए।
आस्मां आँखों को कुछ छोटा पड़ा
सारे मौसम मुट्ठियों में आ गए।
हादसे होते नहीं अब शहर में
यह खबर हमने सुनी, घबरा गए।
तुमको भी लगता हो शायद अब यही
सच वही था, जिससे तुम कतरा गए।
कुठ घरौंदे-सा उगा फिर रेत पर
और हम बच्चों-सा जिद पर आ गए।
रह गई खुलने से यकसर खामोशी
शब्द तो कुछ अर्थ अपना पा गए।
जिंदगी कुछ कम नहीं, ज्यादा नहीं
बस यही अंदाज हमको भा गए।
सच को सच की तर्ह जीने की थी धुन
हम सिला अपने किए का पा गए।
अब कहाँ ले जाएगी ऐ जिंदगी
घर से हम बाजार तक तो आ गए।

चार/

खिलौने तोड़ते, पर तितलियों के नोचते बच्चे
यही कल हो तो कल से कोई उम्मीद क्या रखे।
अचानक ठहर जाती है हवा गुम-गुम-सी होकर और
खटक जाते हैं जंगल को हरापन ओढ़ते पत्ते।
बना जाता है बॉबी दीमकों पेड़ ही सारा
मगर भालू को आते हैं नजर बस शहद के छत्ते।
हिरन को सुनके पंचायत ये इक आवाज में बोली
जिसे जंगल में रहना है, भरोसा शेर पर रखे।
क़सीदे हाकिमों के हों कि मलिका के, क़सीदे हैं
असद साहेब भी क्या-क्या सोच के पहुँचे थे कलकत्ते।

पांच/

तमाशा आँख को भाता बहुत है
मगर यह खून रुलवाता बहुत है।
अजब इक शै थी वो भी जेरे दामन
कि दिल सोचो तो पछताता बहुत है।
किसी की जंग उसे लड़नी नहीं है
मगर तलवार चमकाता बहुत है।
अगर दिल से कहूँ भी कुछ कभी मैं
समझता कम है समझाता बहुत है।
अजब है होशियारी का भी नश्शा
मजा आए तो फिर आता बहुत है।
हसद की आग अगर कुछ बुझ भी जाए
धुआँ सीने में रह जाता बहुत है।
हमारे दुख में तो इस, बात भी थी
तुम्हारे सुख में सन्नाटा बहुत है।

छः/

बिजलियां, लपटें, आशियां और हम
हर तरफ़ फैलता धुआं और हम।
बोने को सौ हरे-भरे मौसम
काटने को उदासियां और हम।
ज़िंदगी ठंडे चूल्हे-चौके सी
दांव देती कमाइयां और हम।
झाडिय़ां झुटपुटे के अफ़साने
खून के छींटे चूडिय़ां और हम।
पांव के नीचे से खिसकती ज़मीं
पंख, परवाज़, आस्मां और हम।
चेहरा-चेहरा जुलूस अपना-सा
दूर तक खाली मुट्ठियां और हम।
लफ़्ज़ हक और लफ़्ज़ का मोहताज
अपने रंग में रंगी ज़ुबां और हम।
रात-दिन, रात-दिन की फोटो-प्रति
काग़जी फूल तितलियां और हम।
होंठ कुछ कहते आंख कुछ बुनती
एक खामोशी दरमियां और हम।
आइने आपकी तरह के सब
अक्स-दर-अक्स किर्चियां और हम।
चीलें मंडराती आस्मानों पर
घर का घर ओढ़े चुप्पियां और हम।

सात/

दिन गुज़रता ये गिरता-पड़ता हुआ
दुख मुझे और मैं दुख को गढ़ता हुआ।
हर पकड़ छूटती पकड़ की तरह
गर्दनों पर दबाव बढ़ता हुआ।
आंख घिरती हुई अंधेरों से
हाथ जैसे चिराग़ गढ़ता हुआ।
खुद से मैं छूटता हुआ पीछे
रौंद कर खुद को आगे बढ़ता हुआ।
भूरा पड़ता एकेक हरा लमहा
सीना-सीना शिग़ाफ़ पड़ता हुआ।     (शिग़ाफ़- दरार)
शब्द शीशा सिफ़त चटखते हुए
अर्थ पारे की तर्ह चढ़ता हुआ।
सोच मिट्टी में इक उतरती हुई
मूड मौसम का कुछ बिगड़ता हुआ।
आदमी बनती-मिटती रेखाएं
और तोता नसीब पढ़ता हुआ।
क्या करूं मैं ये ठहरा - कुछ लेकर
कुछ से, कुछ तो कहीं हो कढ़ता हुआ।

आठ/

तुझ में तुझ से अलग जो है पलता
काश तुझको भी कुछ कभी खलता।
आंख, वो सब पकड़ नहीं पाती
होंठ और कान में जो है चलता।
इतनी परछाइयों में रहते हो
तुम कहां हो पता नहीं चलता।
मैं बताता कि रात का क्या हो
मेरे कहने से दिन अगर ढलता।
हम भी होते हैं अपनी बातों में
काम लफ़्ज़ों ही से नहीं चलता।
तुम अंधेरों को अपने देखो तो
कुछ कहीं है चिराग़-सा जलता।
जो न होना था वो हुआ आखि़र
आदमी हाथ रह गया मलता...।

नौ/

आप कहते हैं जो है पैसा है
हम नहीं मानते सब ऐसा है।
हम तो बाज़ार तक गये भी नहीं
घर में यह मोल-भाव कैसा है।
रात एहसास खुलते ज़ख्मों का
दिन बदन टूटने के ऐसा है।
कुछ के होने का कुछ जबाव नहीं
कुछ का होना सवाल जैसा है।
क्यों कथा अपनी लिख के हो रुसवा
अपना दुख कोई ऐसा-वैसा है।
आपको तो विदेश भी घर-सा
हमको घर भी विदेश जैसा है।
तुमने दिल दे ही मारा पत्थर पर
यह तो जैसे को ठीक तैसा है।

दस/

न मेरा जिस्म कहीं औ’ न मेरी जाँ रख दे
मेरा पसीना जहाँ है, मुझे वहाँ रख दे।
बगूला बन के भटकता फिरूँगा मैं कब तक
यक़ीन रख कि न रख, मुझमे कुछ गुमाँ रख दे।
बिदक भी जाते हैं, कुछ लोग भिड़ भी जाते हैं
प’ इसके डर से, कोई आईना कहाँ रख दे।
वो रात है, कि अगर आदमी के बस में हो
चिराग़ दिल को करे और मकाँ-मकाँ रख दे।
जो अनकहा है अभी तक, वो कहके देखा जाए
ख़मोशियों के दहन में, कोई ज़ुबाँ रख दे।

ग्यारह/

अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं
हम जितना होते हैं अक्सर, उससे भी घट जाते हैं।
तुम्हें तो अपनी धुन रहती है, सफ़र-सफ़र, मंज़िल-मंज़िल
हम रस्ते के पेड़ हैं लेकिन, धूल में हम अट जाते हैं।
लोगों की पहचान तो आख़रि, लोगों से ही होती है
कहाँ किसी के साथ किसी के बाज़ू-चौखट जाते हैं।
हम में क्या-क्या पठार हैं, परबत हैं और खाई है
मगर अचानक होता है कुछ और यह सब घट जाते हैं।
अपने-अपने हथियारों की दिशा तो कर ली जाए ठीक
वरना वार कहीं होता है, लोग कहीं कट जाते हैं।

बारह/

यहीं एक प्यास थी, जो खो गई है
नदी यह सुन के पागल हो गई है।
जो हरदम घर को घर रखती थी मुझमें
वो आँख अब शहर जैसी हो गई है।
हवा गुज़री तो है जेहनों से लेकिन
जहाँ चाहा है आँधी बो गई है।
दिया किस ताक़ में है, यह न सोचो
कहीं तो रोशनी कुछ खो गई है।








मंगलवार, 23 जून 2020

सर्वत जमाल की दस ग़ज़लें


पुराने मक़बरों की शानो शौकत क्या बताऊं मैं
यहां इन्सान की कैसी है हालत, क्या बताऊं मैं
कोई कोई रहज़न, कोई क़ातिल, कोई पागल, कोई जाहिल
इन्हीं लोगों को क्यों मिलती है इज़्ज़त, क्या बताऊं मैं
अमीरों, हुक्मरानों के क़दम तुम ने ही चूमे हैं
अब उन के पांव के तलवों की लज़्ज़त क्या बताऊं मैं
सुना है कल यहां भी अम्न पर तक़रीरें होनी हैं
मगर बस्ती में क्यों फैली है दहशत, क्या बताऊं मैं
यहीं औरत को देवी मानते हैं, पूजा होती है
यहीं छह माह की बच्ची की अस्मत, क्या बताऊं मैं‌।

2

जो हम को थी वो बीमारी लगी ना
हंसी तुम को भी सिसकारी लगी ना
सफ़र आसान है, तुम कह रहे थे
क़दम रखते ही दुश्वारी लगी ना
समन्दर ही पे उंगली उठ रही थी
नदी भी इन दिनों खारी लगी ना
कहा था, पेड़ बन जाना बुरा है
बदन पर आज एक आरी लगी ना
मरे कितने ये छोड़ो, ये बताओ
मदद लोगों को सरकारी लगी ना।
3

नए लहजे उगाए जाते हैं
फिर क़सीदे सुनाए जाते हैं
उस तरफ़ कुछ अछूत भी हैं मगर
पांव किस के धुलाए जाते हैं
कोई बन्धन नहीं है लेकिन लोग
आदतन कसमसाए जाते हैं
मुल्क में अक़्लमंद हैं अब भी
क़ैदख़ानों में पाए जाते हैं
पहले मन्दिर बनाए जाते थे
आज कल मठ बनाए जाते हैं
हम ने ख़ुद को बचाया है ऐसे
जैसे पैसे बचाए जाते हैं
इस अंधेरे से हम को क्या ख़तरा
इस अंधेरे में साए जाते हैं।
4

कभी छिछली कभी चढ़ती नदी का क्या भरोसा है
शेयर बाज़ार जैसी ज़िन्दगी का क्या भरोसा है
यहां पिछले बरस के बाद फिर दंगा नहीं भड़का
रिआया ख़ौफ़ में है, ख़ामुशी का क्या भरोसा है
तबाही पर मदद को चांद भी नीचे उतर आया
मगर इस चार दिन की चांदनी का क्या भरोसा है
मिनट, घन्टे, सेकन्ड इन का कोई मतलब नहीं होता
समय को भांपना सीखो, घड़ी का क्या भरोसा है
वफ़ादारी, नमक क्या चीज़ है, इन्सान क्या जाने
ये कुत्ते जानते हैं, आदमी का क्या भरोसा है
महाभारत में अब के कौरवों ने शर्त यह रख दी
बिना रथ युद्ध होगा, सारथी का क्या भरोसा है।
5

कहां आंखों में आंसू बोलते हैं
मैं मेहनतकश हूं, बाज़ू बोलते हैं
कभी महलों की तूती बोलती थी
अभी महलों में उल्लू बोलते हैं
ज़बानें बंद हैं बस्ती में सब की
छुरे, तलवार, चाक़ू बोलते हैं
मुहाफ़िज़ कुछ कहें, धोखा न खाना
इसी लहजे में डाकू बोलते हैं
भला तोता और इंसानों की भाषा
मगर पिंजरे के मिट्ठू बोलते हैं
वहां भी पेट ही का मसअला है
जहां पैरों में घुंघरू बोलते हैं
जिधर घोड़ों ने चुप्पी साध ली है
वहीं भाड़े के टट्टू बोलते हैं
बस अपने मुल्क में मुस्लिम हैं 'सर्वत'
अरब वाले तो हिन्दू बोलते हैं।

6

सारा गाँव एकजुट था, अड़ गई हवेली फिर
और इक तमाचा-सा जड़ गई हवेली फिर
लालमन की हर कोशिश मिल गई न मिट्टी में
चार बीघा खेतों में बढ़ गई हवेली फिर
था गुमान भाषा में अब के हार जाएगी
कुछ मुहावरे लेकिन गढ़ गई हवेली फिर
मीलों घुप अंधेरे में रात भर चला, फिर भी
भोर में हथेली से लड़ गई हवेली फिर
नंगे-भूखे लोगों की खुल गईं जुबानें जब
आ के उनके पैरों में पड़ गई हवेली फिर
ज़ोर आज़माइश की, हर किसी ने कोशिश की
एक पल को उखड़ी थी, गड़ गई हवेली फिर।

7

अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं
कभी सूखे से डरते हैं, कभी पानी से डरते हैं
तब उल्टी बात का मतलब समझने वाले होते थे
समय बदला, कबीर अब अपनी ही बानी डरते हैं
पुराने वक़्त में सुलतान ख़ुद हैरान करते थे
नये सुलतान हम लोगों की हैरानी से डरते हैं
हमारे दौर में शैतान हम से हार जाता था
मगर इस दौर के बच्चे तो शैतानी से डरते हैं
तमंचा ,अपहरण, बदनामियाँ, मौसम, ख़बर, कालिख़
बहादुर लोग भी अब कितनी आसानी से डरते हैं
न जाने कब से जन्नत के मज़े बतला रहा हूँ मैं
मगर कम-अक़्ल बकरे हैं कि कुर्बानी से डरते हैं।

8

कितने दिन, चार, आठ, दस, फिर बस
रास अगर आ गया कफस, फिर बस
जम के बरसात कैसे होती है
हद से बाहर गयी उमस फिर बस
तेज़ आंधी का घर है रेगिस्तान
अपने खेमे की डोर कस, फिर बस
हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस
सब के हालात पर सजावट थी
तुम ने रक्खा ही जस का तस, फिर बस
थी गुलामों की आरजू, तामीर
लेकिन आक़ा का हुक्म बस, फिर बस
सौ अरब काम हों तो दस निकलें
उम्र कितनी है, सौ बरस, फिर बस

9

अमीर कहता है इक जलतरंग है दुनिया
गरीब कहते हैं क्यों हम पे तंग है दुनिया
घना अँधेरा, कोई दर न कोई रोशनदान
हमारे वास्ते शायद सुरंग है दुनिया
बस एक हम हैं जो तन्हाई के सहारे हैं
तुम्हारा क्या है, तुम्हारे तो संग है दुनिया
कदम कदम पे ही समझौते करने पड़ते हैं
निजात किस को मिली है, दबंग है दुनिया
वो कह रहे हैं कि दुनिया का मोह छोड़ो भी
मैं कह रहा हूँ कि जीवन का अंग है दुनिया
अजीब लोग हैं ख्वाहिश तो देखिए इनकी
हैं पाँव कब्र में लेकिन उमंग है दुनिया
अगर है सब्र तो नेमत लगेगी दुनिया भी
नहीं है सब्र अगर फिर तो जंग है दुनिया
इन्हें मिटाने की कोशिश में लोग हैं लेकिन
गरीब आज भी जिंदा हैं, दंग है दुनिया।

10

लिखते हैं, दरबानी पर भी लिक्खेंगे
झाँसी वाली रानी पर भी लिक्खेंगे
आप अपनी आसानी पर भी लिक्खेंगे
यानी बेईमानी पर भी लिक्खेंगे
महलों पर लोगों ने ढेरों लिक्खा है
पूछो, छप्पर-छानी पर भी लिक्खेंगे
फ़रमाँबरदारों को इस का इल्म नहीं
हाकिम नाफ़रमानी पर भी लिक्खेंगे
अपना तो कागज़ पर लिखना मुश्किल है
और अनपढ़ तो पानी पर भी लिक्खेंगे
बस, कुछ दिन, खेती भी किस्सा हो जाए
खेती और किसानी पर भी लिक्खेंगे
हम ने सर्वत प्यार मुहब्बत खूब लिखा
क्या हम खींचातानी पर भी लिक्खेंगे।




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सोमवार, 8 जून 2020

ये हिन्दी ग़ज़ल है


- सर्वत जमाल

सदियों पहले जब गज़लों ने भारत में क़दम रखे तब ईरान से चली इस इस विधा की भाषा फारसी थी और परिभाषा थी- ’महबूब से बातचीत।’ उन दिनों हिन्दुस्तानी भाषा (हिन्दी/उर्दू) में जिन लोगों ने ग़ज़लें कहने की कोशिश की, उन्हें जाहिल, गंवार तक कहा गया। कारण था, गज़लों का फ़ारसी भाषा में न होना। उस ज़माने आम तौर पर शहंशाह, नवाब, ज़मींदार और ऊंचे तबक़े के, पढ़े-लिखे लोग ही शायरी करते थे। उन लोगों ने यह ग्रंथि पाली थी कि ग़ज़ल सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़ारसी में ही होगी। ग़ज़ल का मज़मून भी महबूब -इश्क-मुहब्बत-शराब तक ही सीमित था।
लेकिन धीरे धीरे ग़ज़ल ने अपने पांव पसारने शुरू किए। ग़ज़ल उर्दू भाषा में हिन्दुस्तानी अवाम के दिलो-दिमाग़ पर राज कने लगी। फिर भी ग़ज़ल के (परंपरागत) विषय से हटने की जुर्रत किसी भी शायर ने नहीं दिखाई।
तीन सदी पहले का ज़माना हुआ, हैदराबाद दकन पढ़े-लिखे लोगों की बस्ती थी, शायरी की धूम थी। ऐसे वक़्त में ’वली’ ’ दकनी का यह शेर(मतला) अवाम की ज़बान पर चढ़ गयाः
“मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का एतबार खोती है।“
उस दौर में यह गज़ल का विषय था ही नहीं। बहुतों ने नाक-भौं चढ़ाई। मगर जिस शेर को अवाम ने सर चढ़ा लिया हो, उससे निगाहें फेरना भी मुमकिन नहीं था। बाद के दिनों में मीर, सौदा, इंशा, हाली , मोमिन  वग़ैरह ने तो वली दकनी के शेर की रोशनी को और ज़िन्दगी बख़्शी। मिर्ज़ा ग़ालिब ने तो ग़ज़लों को एक नया और अनूठा लहजा तक दे डाला। इक़बाल, फ़ैज़, जोश, फ़िराक़, साहिर ने ग़ालिब की परम्परा को आगे, बहुत आगे पहुँचा दिया। लगभग चार सौ सालों से ग़ज़ल भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से में लोगों के दिलों पर राज कर रही है और अभी दूए-दूर तक इसकी लोकप्रियता कम होने के आसार भी नज़र नहीं आते।
हिन्दी साहित्य की महान विभूति पंडित सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने ग़ज़लों की हिन्दी में शुरूआत की। बात आई गयी हो गयी (कबीर तथा उनके समकालीन कई रचनाकारों ने भी ग़ज़लें कहने की कोशिशें की हैं)। लेकिन...हिन्दी ग़ज़लों का चलन शुरू हो गया। बात फिर भी नहीं बन रही थी। उर्दू ग़ज़लें - हिन्दी ग़ज़लों पर २१ नहीं, २८-३० पड़ रही थीं। हिन्दी ग़ज़लकार भी दोषी करार दिए जायेंगे कि उन्होंने ग़ज़लों पर मेहनत नहीं की बल्कि हिन्दी के क्लिष्ट शब्दों को जबरन ठूंसने जैसी हरकतें ज़ियादा कीं। फिर... दुष्यंत कुमार का आगमन हुआ. छोटी सी उम्र में एक नन्हा सा ग़ज़ल संग्रह ’साए में धूप’ क्या आया, हिन्दी ग़ज़लों की धूम मच गयी. पानी पी पी कर कोसने वाले कुछ उर्दू के शायरों तक ने दुष्यंत और हिन्दी ग़ज़ल का लहजा अपनाया. यही सिलसिला जारी है और मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि दुष्यंत ने साए में धूप से जिस सफ़र की शुरूअत की थी, बाद के रचनाकारों ने उसे मन्ज़िल के काफ़ी क़रीब पहुंचा दिया.
हिन्दी ग़ज़लों की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि बहुत से प्रख्यात गीतकार, कथाकार, निबंधकार यहाँ तक की कविता (अतुकांत) के लोग भी इस विधा से जोर आज़माइश करते नज़र आए । मुझे कुछ या किसी का भी नाम लेने, बताने की ज़रूरत नहीं, हक़ीक़त यह है कि गीतों/कहानियों/निबंधों और अख़बारों में ख़बरें लिख कर अपनी लेखनी का लोहा मनवा लेने वाले रचनाकार, ग़ज़ल के मोह में फंस कर, बुरी तरह धराशायी हुए। उनका यह ग़ज़ल प्रेम, ग़ज़ल की भाषा में कुछ ऐसा ही थाः
“ख़रीदेंअब चलो रुस्वाइयां भी
चलो उसकी गली भी देख आयें “
दरअस्ल ग़ज़ल ने जब महबूब का दामन छोड़ कर, आम आदमी के सरोकारों से नाता जोड़ा, फ़ारसी या गाढ़ी वाली उर्दू की आग़ोश से निकल कर, आम बोलचाल की भाषा के पहलू में बैठी तो यह ख़ास ही नहीं, आम की भी चहेती बन गयी। सिर्फ़ दो मिसरों में एक पूरी कहानी समो लेना, ग़ज़ल का ऐसा हुनर है, जिसने पाठकों/श्रोताओं के साथ क़लमकारों को भी अपने आकर्षण से जकड़ लिया। एक बाढ़ सी आई हुई है ग़ज़लों और ग़ज़लकारों की। ग़ज़लों को सामंती व्यवस्था का पैरोकार, नशा पिलाने वाली, कोठे वाली कह रही पत्रिकाओं ने भी ग़ज़ल विशेषांक प्रकाशित किए। बहुत से लोगों ने तो ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित कराने-कराने का धंधा ही खड़ा कर लिया है
लेकिन ग़ज़लकारों के इस सैलाब में कामयाब कितने हैं? ग़ज़ल की शास्त्रीयता, उसके नियम, क़ायदे-क़ानून को जाने-समझे बग़ैर लोगों ने लिखना शुरू कर दिया और अवाम ने उन्हें नकारना। परन्तु गज़लकारों ने हौसला नहीं छोड़ा। एक बड़ी तादाद ने इसका भी हल ढूंढ लिया। वे छाती ठोंककर कहते हैं -“ये हिन्दी ग़ज़ल है, ये ऐसी ही होती है।“
सवाल यह है कि अगर यह’ ऐसी ही होती है’ तो दुष्यंत कुमार की ऐसी क्यों नहीं हैं? तुफ़ैल चतुर्वेदी, महेश अश्क, सुलतान अहमद, इब्राहीम अश्क, अदम गोंडवी,ज्ञान प्रकाश विवेक, विज्ञान व्रत,देवेन्द्र आर्य, अंसार क़म्बरी राजेंद्र तिवारी, शेरजंग गर्ग और इस ’नाचीज़’ की ऐसी क्यों नहीं? क्या वो तमाम ग़ज़लगो, जो ग़ज़लों को मीटर (बहरों) की बंदिश में रखते हुए भी,कथ्य को शेरो की शक्ल देने में कामयाब हैं, हिन्दी ग़ज़लें नहीं कह रहे हैं? अगर हिन्दी ग़ज़लों का अर्थ अशुद्धियाँ-त्रुटियां ही हैं तो उन रचनाकारों को चाहिए कि वे दुष्यंत को भी हिन्दी ग़ज़ल के ख़ैमे से ख़ारिज कर दें।
ग़ज़लें लगभग ४०० साल से भारत में लोकप्रिय हैं। पिछले ३०-३५ वर्षों से हिन्दी ग़ज़ल के नाम पर कुछ लोगों द्वारा जो परोसा जा रहा है, भारतीय जनमानस उसे लगातार नकारता आ रहा है। अगर चार सदियों में, शायरों ने ग़ज़ल के क़ायदे-क़ानून सीख कर ही शायरी की है तो ये बाक़ी लोग सीखने से गुरेज़ क्यों रखते हैं? क्या भारतीय चुनाव व्यवस्था की तरह ’इतने सरे बुरे लोगों में से कम बुरे को नें’ की तर्ज़ पर ये लोग अपनी ग़ज़लें भी परवान चढ़ाना चाहते हैं? ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने दें। न लिख सकें तो कविता की कई विधाएं हैं, उन में क़लम आज़मायें। ग़ज़ल ही लिखने के लिए किसी डाक्टर ने मशवरा दिया है क्या?

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राजकिशोर राजन की कविताएं


(कुछ कवि खामोशी से अपना काम करते हैं, जैसे राजकिशोर राजन। यह खामोशी अक्सर गंभीरता में बदल जाती है, जैसे राजकिशोर राजन की कविताएँ। राजकिशोर राजन पचास के आसपास के कवि हैं, अपने समय के कवियों में एक जरूरी खामोश धुन की तरह की तरह मौजूद हैं। राजन कविता की चौपाल में बैठकर वक्त गँवाने वाले कवि नहीं हैं। एक समर्थ कवि अपने लिखने की मेज के आसपास नितांत अकेला होता है। कह सकते हैं कि कवि मेज के बिना भी कविताएँ लिख रहा होता है, मैं कहूँगा कि हाँ, लेकिन वह जहाँ वह खड़े-खड़े कविता लिख रहा होता है, वह खड़े होने की मुद्रा ही मेज हो जाती है। बात तो उस जगह और वक्त की है, जहाँ वह रच रहा होता हैं। राजन वयस्क कवि हैं। कविता में कवि की वयस्कता का प्रमाण उम्र कतई नहीं है। साठ के आसपास के कवि भी अपरिपक्व हो सकते हैं और पचास के पास का कवि बहुत परिपक्व। मैं इधर तरह-तरह के अनुभवों से गुजर रहा हूँ।
   अनुभव करता हूँ कि राजन अपनी कविताओं के प्रति बेहद संजीदा हैं। एक-एक शब्द उनके लिए कीमती है। उन्हें पता है कि कब कहाँ क्या करना है। किस शब्द को किस जगह पर रखना हैं। कईबार यह सब अनुभव और दूयसरे कवियों के अनुभव को जानने से भी आ जाता है। राजन के व्यक्तित्व की शालीनता और सहजता और विनम्रता उनकी कविताओं में चरितार्थ होते देखता हूँ। उनकी एक छोटी कविता ‘‘राग’’ देखें,-
‘‘अकस्मात् ही हुआ होगा
कभी दबे पैर आया होगा
ईर्ष्या-द्वेष
घृणा-बैर आदि के साथ
जीवन में राग

फिर न पूछिए !
क्या हुआ ...................
कुछ भी नहीं बचा
बेदाग ।’’
      राजन की पारदर्शी कविताओं में भी जीवन के गूढ़ प्रश्न बुद्ध की रोशनी में सुलझे हुए मिलते हैं। राजन को बुद्ध प्रिय हैं। बुद्ध के विचार प्रिय हैं-
‘‘पृथ्वी से ऊपर नहीं 
पृथ्वी पर ही 
है संभावना
मुक्ति, आनंद की 
प्रेय और श्रेय की ’’
        राजन जीवन के असंख्य दुख और बाधाओं सें मुक्ति और जीवन के सच्चे आनंद की खोज इसी पृथ्वी पर करते हैं। सबके दुख में झाँकते हैं, सबके दुख को छूते हैं। अपने गाँच-जवार के दुख के पास पहुँचते हैं। जीवन की हजार मुश्किलें हैं, हजार दुख। अकेलापन का दंश भी भी एक दुख है। राजन को भी बुद्ध की तरह एक वृद्धा का दुख व्यथित करता है-
‘‘उस औरत को कोई समझाये नहीं 
इस क्रूर, निर्मोही समय के बारे में 
कि हर घर, शहर और देश
अब बूढ़ों के लिए है परदेश’’
राजन को दुख की पहचान है तो उससे मुक्ति का मार्ग भी पता है-
‘‘उस वृठ्ठा से कोई मिले तो इतना जान लेगा
कि जीवन विविधताओं से भरा अनथक युठ्ठ है
और जो जीवन भर लड़ेगा, वही जीवन को जियेगा’’
राजन अपने समय के यथार्थ से उपजे दुख को, प्रकृति की मार से उपजे दुख को और शासन की उपेक्षा से उपजे दुख को एक में मिलाकर अपने समय को देखते हैं, अपने परिवेश की मुश्किलों को देखते हैं-
‘‘उस इलाके में सड़क का पता नहीं 
कब बनी और कहाँ गुम हो गयी 
जैसे कि सड़क को भी मालुम 
न ये, कहीं जाने वाले
न यहाँ, कोई आने वाला ।’’
   ऊपर-ऊपर से अभिधा में कही जाने वाली बात दरअसल सिर्फ अभिधा में नहीं हैं। पंक्तियों के बीच में और उनके पार्श्व में अर्थ की जो धुन बजती है, वह यह कि सड़क का गुम हो जाना साधारण बात नहीं है, आदमी का गुम हो जाना तो हम जानते हैं, लेकिन सड़क का गुम हो जाना, व्यवस्था का गुम हो जाना है, शासन का गुम हो जाना हैं, गाँव और जवार के लोगों के जीवन में आने वाली खुशहाली की डोली का गुम हो जाना है, अच्छे दिन के संग सड़क का भाग जाना है। ‘‘न ये कहीं जाने वाले हैं और न यहाँ कोई आने वाला है’’ के पीछे की गूँज यह कि ये अपने किसी प्रिय से मिलने या अपनी जरूरतों की फरियाद लेकर किसी हाकिम के पास जाने वाले हैं या इनके पास क्या है कि जिसे लेकर बाजार जाएँ कुछ खरीदने के लिए। न कोई उधर से दनकी सुध लेने के लिए आने वाला है। कोई हाकिम, कोई मंत्री कोई जनप्रतिनिधि, कोई ऐसा जो इनकी बात ऊपर पहुँचाये और इनके जीवन का अँधेरा दूर करे, उजाला लाए, दुख से मुक्ति दिलाए। यह सब कहने की जरूरत नहीं थी, इसलिए कहा कि राजन की बहुत साधारण पंक्ति को अदेख करना कविता की संभावना को अदेख करना है। 
  राजन को अपने समय की कविता का बुद्ध समझ लेना जल्दबाजी होगी। राजन को कवि समझें जरूरी यह है। राजन जीवन और समाज के दर्द के कवि ही नहीं है, प्र्रेम के भी कवि हैं। प्रेंम और करुणा कविता के दो पाट हैं, जिनके बीच अक्सर अच्छी कविता की आवाजाही होती रहती है। हाँ, बड़ी कविता में जीवन के गहरे संदर्भों के साथ प्रेम और करुणा के साथ ओज तथा अविस्मरणीय चरित्र का तत्व भी जुड़ जाता है। मैं बड़ी कविता की कोई परिभाषा नहीं दे रहा हूँ, सिर्फ अपना अनुभव साझा कर रहा हूँं। - गणेश पाण्डेय)

कविताएं/

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कला और बुद्ध
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सौन्दर्य तो पात-पात में
क्या देखना पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण
ऊपर-नीचे
वह नित परिवर्तित सौन्दर्य
है कण-कण में विद्यमान
वही सत्य का आधार
जिसका, न आर - न पार
जो कर लेता
अपने हृदय में
उस अप्रतिम सौन्दर्य का संधान
कला करती उसी का अभिषेक
करती उसी का सम्मान

जब तक, इसका नहीं ज्ञान
तब तक, सकल मान-अभिमान ।

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दंगश्री
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पृथ्वी से ऊपर नहीं 
पृथ्वी पर ही 
है संभावना
मुक्ति, आनंद की 
प्रेय और श्रेय की 

दंगश्री पर्वत की ओर
उँगली उठा
बुद्ध ने कहा था
आकाश को 

और सदा से 
आकाश की ओर टकटकी लगाए
मनुष्य को कहा 
लौटने को पृथ्वी पर

दंगश्री, दंग है 
अब तक ।

नोट- दंगश्री एक पर्वत का नाम है ।

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कविता का स्वाद
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आम में नहीं हो
आम का स्वाद

अमरूद में नहीं हो
अमरूद का स्वाद

और न इमली में हो
इमली का स्वाद

ठीक उसी तरह
कविता में हो
सबकुछ इफरात
मगर नहीं हो 
कविता का स्वाद

तो सब छूँछा !

मजा तो देखिये !
पोपले मुँह वालों के ऊपर है 
कि बतायें हमें
कविता का स्वाद !

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बाढ़ में घिरे लोग
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उस इलाके में बाढ़ को लोग यही कहते हैं 
कि बढ़ आया है पानी गंगा और गंडक का 
बाढ़ से इनका पुराना हेलमेल 
जैसे गरीबी हूक, अमीरी का अहंकार से

अगर इन्हें मैं दिखाऊँ कि 
यहाँ की अंतहीन त्रासदी पर 
लिखी है मैंने कविता
तो मेरी समझ पर वे ठठा कर हँसेंगे 
और वह लड़की तो हँसते लोटपोट हो जायेगी
जो पढ़ती है कक्षा आठ में
जिसका सरकारी स्कूल
महीनों डूबा रहता, बाढ़ के पानी में तैरते 
उसने पढ़ाई और स्कूल के बारे में सोचना
और अफसोस करना छोड़ दिया 
और इन दिनों सीख रही है सिलाई-कढ़ाई
अपनी सखी-सलेहर की तरह वह भी 
पास कर लेगी जैसे-तैसे 
विवाह के पूर्व मैट्रिक की परीक्षा 

वह लड़की मेरी कविता सुन
कहेगी जरूर
कि यह भी भला लिखने की चीज है 
हो न हो, आप रहते हैं परदेश में 
जिसे मालूम नहीं लोग कैसे रहते हैं देश में 

उस इलाके में सड़क का पता नहीं 
कब बनी और कहाँ गुम हो गयी 
जैसे कि सड़क को भी मालुम 
न ये, कहीं जाने वाले
न यहाँ, कोई आने वाला ।

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एक मरणासन्न वृद्धा के नाम
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उस औरत से पूछे मत कोई हालचाल
नहीं तो फिर कहीं फटेगा बादल
नदियों में आयेगी बाढ़
रोते-रोते उसका, होगा बुरा हाल

रोते-रोते सोना और सोते-सोते रोना
उसके लिए जिन्दगी को जीने का
दूसरा नाम है
और जब तक रहेगा पानी उसकी आँखों में 
वह मरेगी नहीं इतना तय है 

जो उससे मिलने जाता
चला जाता कथा-कहानियों के देश में 
जहाँ वह बचपन में चराती थी बकरियाँ 
और अकसर बैठ जाती महुआ के नीचे 
लाल रिबन बाँधे, आँखों में काजल लगाये 
खेलने लग जाती, कित्......कित्......कित्......कित्

छउरा में डेग रख, एक दिन उसे भी जाना पड़ा था
सास-ससुर, देवरानी-जेठानी से भरे-पूरे परिवार में 
फिर कभी लाल साड़ी में बिहँसते 
कभी रोत-सिसकते
कैसे कट गयी उम्र, पति को मनाते 
बेटे-बेटियों को ढेबुआ (पैसा) का मर्म समझाते
कभी रोटी के साथ नून-तेल
भात के साथ आम के अचार का मसाला सान खाते 

धीरे-धीरे साथ छोड़ते गये 
पति से लेकर लरिकाई की सखि लालमुनी भी 
बेटी रहती दिल्ली में यमुनापार
और बेटे आबाद हो गये अपनी पत्नियों संग
अलग-अलग शहरों में 
पर उस वृठ्ठा का मानना है कि नहीं हो दुख तो 
पहाड़ जैसी जिन्दगी कैसे लगेगी पार
उसने नहीं की कभी ईश्वर से शिकायत
नहीं की कभी पास-पड़ोस के लोगों से नालिश
हर दुपहरिया दुहकर बकरी का दूध
वे कभी पूछने भी नहीं आते 
कि माँ, एक लोटा पी लो पानी

उस औरत को कोई समझाये नहीं 
इस क्रूर, निर्मोही समय के बारे में 
कि हर घर, शहर और देश
अब बूढ़ों के लिए है परदेश
नहीं तो भर-भर आँचर गाली देगी 
और तुनककर कहेगी कि करने चले हो छाव
पसारते हो देह पर झूठ की चादर
उसको भरोसा है कि धरती पर अभी भी
है अच्छाई का राज
और सभी की होती है, उसकी तरह
गरीबी, लाचारी और अभाव से विवाह

जब वह पीती है चापाकल पर पानी
गीली हो जाती देह
ठठा कर हँसते बच्चे, उससे चुहलबाजी करते
पर वह कभी बुरा नहीं मानती, न देती गाली
उनसे बोलते-बतियाते आगे बढ़ जाती

उससे कोई मिले तो मेरे बारे में मत पूछे
चूँकि मेरे गाँव के सीवान पर है उसका घर
नहीं तो वह कहेगी
कि लिखते-लिखते फवित-फवित
मर, भस गया राधाकिसुन का बेटवा
रहता है छपरा-पटना, ऐन्ने-ओन्ने, केन्ने-केन्ने
मुँह दिखाने भर को आता है गाँव 

उस वृद्धा से कोई मिले तो इतना जान लेगा
कि जीवन विविधताओं से भरा अनथक युद्ध है
और जो जीवन भर लड़ेगा, वही जीवन को जियेगा
और यह भी कि जो अपने समय से भागेगा
उसके लिए कभी समय नहीं बदलेगा ।