[हाँ, लो फिर कहता हूँ कि पृथ्वी की सभी अच्छी कविताओं में अद्भुत सखियारा है। लू शुन की ये गद्य कविताएँ निश्चय ही शानदार हैं। इधर की हिंदी की गद्य कविताओं को लेकर अक्सर नाराजगी रही है तो उसकी वजह कविता की भाषा के प्रति भयंकर लापरवाही है। पहले और सबसे पहले उसका कविता होना जरूरी है। याद रखना चाहिए कि काव्यभाषा कविता की जननी है। तनिक पहले की हिंदी कविता में गद्यकाव्य एक काव्यरूप रहा है, वियोगी हरि के गद्यकाव्य ने ध्यान खींचा था। हालांकि वियोगी हरि के गद्यकाव्य की भाषा में कविताई कम है और देख लें, लू शुन में बहुत ज्यादा। वस्तु और रूप का भी अंतर है। लू शुन का समय भी तनिक कुछ और पहले का है। सुखद यह कि लू शुन की इन गद्य कविताओं में कोई बहुत मजबूत चुंबक है, जो वहाँ से, यहाँ से क्षणभर में खींच लेता है । दिगम्बर को अच्छे अनुवाद के लिए बधाई के साथ यात्रा-7 से फिर कुछ कविताएँ।-संपादक,यात्रा।]
लू शुन की गद्य कविताएँ
अनुवाद: दिगम्बर
(विश्व साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर लू शुन ने सृजानात्मक लेखन की तुलना में ज़नोन्मुख लेखकों की नयी पीढ़ी तैयार करने और सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को अधिक महत्त्व दिया. पिछड़े हुए चीनी समाज के लिए यह ऐतिहासिक दायित्व स्वतंत्र लेखन से कहीं अधिक महत्व रखता था. इस कलम के सिपाही ने साहित्यिक लेख, व्यंग्य, लघु कथाएँ, कहानियाँ, समीक्षात्मक लेख और ऐतिहासिक उपन्यास के साथ-साथ गद्य कवितायेँ भी लिखीं. उनकी गद्य कविताओं का संकलन ‘वाइल्ड ग्रास’ नाम से प्रकाशित हुआ है. 1924 से 1926 लिखी गयी इन गद्य कविताओं साम्राज्यवाद और उत्तरी युद्ध सरदारों के खिलाफ प्रतिरोध और दमन की अभिव्यन्ज़ना सांकेतिक और अमूर्त शैली में की गयी है. इसका कारण शायद यह रहा हो कि उस समय साहित्य को कठोर सेंसर से गुज़ारना होता था.
इन गद्य कविताओं में ऊपर-ऊपर देखने पर निराशा और भयावहता की झलक मिल सकती है, लेकिन इन प्रतीकात्मक कविताओं के विविध रंग हैं. इनमें स्वप्न का सृज़न है जिनमें दुःस्वप्न भी शामिल हैं. यहाँ कुत्ते से वार्तालाप है, कीड़ों कि भिनभिनाहट है और इंसानों की नज़र से खुद को छिपाने की कोशिश करता आकाश है. समाज के ढोंग-पाखंड, निष्क्रियता, हताशा और ठहराव पर विक्षुब्ध टिप्पणी है जो मुखर नहीं है.
‘वाइल्ड ग्रास’ की भूमिका में लू शुन ने लिखा है- “धरती के भीतर तीव्र वेग से जो अग्नि-मंथन हो रहा है, उस का लावा जब सतह पर आएगा, तो वह सभी जंगली घासों और गहराई से धंसे विष-वृक्षों को जला कर खाक कर देगा, ताकि सडान्ध पैदा करनेवाली कोई चीज़ न रह जाय.”-दिगम्बर)
बर्फ
दक्षिण की बारिस कभी भी जमकर ठण्डे चमकदार बर्फ के फाहों में नहीं बदलती। जिन लोगों ने दुनिया देखी है वे इसे नीरस मानते हैं, क्या बारिस भी इसे दुर्भाग्य समझती है? चांगजियांग (यांग्त्से) नदी से दक्षिण का इलाका बहुत ही तर और मनोहर है, जैसे वसन्त का पहला अकथ संकेत या तंदुरुस्ती से दीप्त किसी लड़की का खिला यौवन। उलाड़ बर्फीले इलाके में कमेलिया के रक्ताभ फूल हरे और सुनहरे रंगों के साथ घुलीमिली आलूचे के फूलों की सफेद मंजरी, शीतकालीन आलूचे के घण्टीनुमा फूल और बर्फ के नीचे छिपे हुए ठंडे हरे बीज। तितलियाँ वहाँ बिल्कुल नहीं हैं और मुझे ठीक से याद नहीं कि मधुमक्खियाँ कमेलिया के फूलों और आलूचे की मंजरी से शहद इकट्ठा करने आती भी हैं या नहीं। लेकिन अपनी आँखों के आगे मैं देख सकता हँू बर्फीले उजाड़ में शीतकालन फूलों पर मंडराती मधुमक्खियाँ - मैं सुन सकता हूँ उनकी भनभनाहट और उनकी गुँजन।
बर्फ का बुद्ध बनाने के लिए इकट्ठा हुए सात या आठ बच्चे, अदरख के कोंपलों-जैसी अपनी छोटी-छोटी लाल उँगलियों को अपनी साँसों से सेंक रहे हैं। जब वे सफल नहीं हुए, तो उनमें से किसी के पिता उनकी मदद करने आये। बुद्ध की ऊँचाई बच्चों से अधिक है और हालाँकि यह सेब के आकार का एक ढेर है जो कद्दू भी हो सकता है या बुद्ध भी, लेकिन यह सफेद और चमकदार सुन्दरता लिये हुए है। अपनी नमी से गुँथी यह पूरी छवि चमक और टिमटिमा रही है। बच्चे फल की गुठली से उसकी आँख और अपनी माँ के सिंगारदान के टूटे हुए हिस्से से होंठ बनाते हैं। तो इस तरह बन गये आदर योग्य बुद्ध। चमकदार आँखों और लाल होंठों वाले बुद्ध बर्फ के मैदान में खड़े हैं।
अगले दिन कुछ बच्चे उसे देखने आये। उसके आगे ताली बजाते हुए वे अपना सिर हिलाते और हँसते हैं। बुद्ध वहाँ अकेले बैठे हैं। धूप भरा दिन उनकी चमड़ी पिघला देता है। लेकिन ठंडी रात उस पर एक नयी परत चढ़ा देता है। और यह अपारदर्शी स्फाटिक में बदल जाता है। कुछ दिन और धूप खिलने पर इसको पहचान पाना मुश्किल हो जाता है और उसके चेहरे पर चिपका सिंगारदान को टुकड़ा गायब हो जाता है।
लेकिन उत्तर में गिरने वाले बर्फ के फाहे अन्तिम समय तक रेत या चूरा जैसे ही रहते हैं और जमते नहीं, चाहे वे छत पर बिखरे हों, या जमीन पर या घास पर। घर में जलते चूल्हे की गर्मी ने बर्फ को पिघला दिया। जो बाकी बचे रहे वे खुले आकाश से उठने वाले बवंडर के साथ बेतहाशा ऊपर उठते हैं और सूरज की धूप में ऐसे चमकते हैं जैसे लपट के इर्दगिर्द घना कोहरा। वे तब तक चक्कर खाते और ऊपर उठते रहते हैं, जब तक कि सारा आकाश ढक नहीं जाता और जब वे चक्कर लगाते ऊपर उठते हैं तो पूरा आकाश टिमटिमाने लगता है।
असीम उजाड़ में स्वर्ग के शीतल मेहराब के नीचे यह चमचमाती, सर्पिल गति से नाचती प्रेतात्मा बारिश का भूत है।
18 जनवरी 1925
पतझड़ की रात
मेरे घर के पिछवाड़े की दीवार के उस पार आपको दो पेड़ दिखाई देंगे: एक खजूर का पेड़ है और दूसरा भी खजूर का पेड़ है। उनके ऊपर अनूठा और ऊँचा रात्रिकालीन आकाश है। मैंने पहले कभी ऐसा अनुपम और उत्तुंग आकाश नहीं देखा। लगता है कि वह आदमियों की दुनिया छोड़ देना चाहता है, ताकि जब लोग सिर उठायें तो उसे देख ही न पायें। हालाँकि इस क्षण यह पूरी तरह नीला है और इसकी सितारेनुमा आँखें भावशून्य टिमटिमा रही हैं। एक बुझी-बुझी सी हँसी इसके होंठों के इर्दगिर्द खेल रही है, एक ऐसी हँसी जो काफी अर्थपूर्ण लगती है और पाले की मोटी परत से हमारे अहाते के जंगली पौधों को ढँक रही है।
मुझे पता नहीं कि इन पौधों को क्या कहते हैं, अमूमन किन नामों से ये जाने जाते हैं। मुझे याद है कि उनमें से एक पर छोटे-छोटे गुलाबी फूल खिलते हैं और ये फूल अभी भी कायम हैं, हालाँकि ये पहले से कहीं ज्यादा छोटे हैं। जाड़े की रात की ठंडी हवा में काँपते हुए ये सपना देख रहे हैं- वसन्त आने का सपना, पतझड़ आने का सपना, जब कोई दुबला पतला कवि उनकी अन्तिम पंखुरियों पर अपने आँसू ढलकाएगा जो कहता है कि पतझड़ आएगा, जाड़ा आएगा, लेकिन वसंत भी आयेगा जरूर जब तितलियाँ इधर उधर मंडराएंगी और समस्त मधुमक्खियाँ वसंत के गीत गुनगुनायेंगी। तब छोटे गुलाबी फूल मुस्कुराते हैं, हालाँकि ठण्ड से उनमें विषादमय लाली आ गयी है और वे अभी भी काँप रहे हैं।
जहाँ तक खजूर के पेड़ों की बात है, उनकी सारी पत्तियाँ झड़ गयी हैं। पहले एक या दो लड़के खजूर तोड़कर गिराने के लिए आये, जबकि बाकी लोग चूक गये। लेकिन अब एक भी खजूर नहीं बचा और पेड़ की पत्तियाँ भी गायब हो गयीं। गुलाबी फूलों ने पतझड़ के बाद वसंत आने का जो सपना देखा है, उसके बारे में इन्हें मालूम है और ये इस सपने से भी वाकिफ हैं कि पतझड़ में जो पत्तियाँ गिर गयी हैं, वे वसंत में फिर उग आयेंगी। भले ही उन्होंने सारी पत्तियाँ गिरा दी और अब केवल शाखाएं ही बची हुई हैं, लेकिन अब वे फलों और पल्लवों के बोझ से झुकी नहीं हैं। तभी तो वे आराम लहरा रहीं हैं। हालाँकि अभी भी कुछ टहनियाँ मुरझा कर लटक रही हैं और खजूर तोड़ने के दौरान छड़ी से उनकी छाल पर जो घाव लगे हैं वे धीरे-धीरे मर रहे हैं, जबकि जो टहनियाँ लोहे की छड़ की तरह सीधी और लंबी हैं वे आकाश की ओर तनी उसमें छेद करती महसूस हो रही है, तभी तो वह व्याकुल होकर आँखें मटमटा रहा है। वे पूर्णिमा के चाँद को भी बेध रही हैं जिससे वह बुझी-बुझी और बेचैन लग रहा है।
कातर भाव से आँखें मटमटाते हुए आकाश और नीला, और नीला होता जा रहा है, मानो वह चाँद को पीछे छोड़ते हुए आदमियों की दुनिया से भागना चाहता है और खजूर के पेड़ों से आँख चुराना चाहता है। लेकिन चाँद भी पूरब में खुद को छुपाये हुए है, जबकि अभी तक मौन और लोहे के छड़ की तरह दृढ नंगी टहनियाँ अनूठे और उतुंग आकाश में छेद कर के उस पर जान लेवा घाव करने पर आमादा हैं, चाहे वह अपनी सारी सम्मोहक आँखों से जितने ही तरीके से आँखे झपका ले।
एक खूंखार निशाचर पंछी चीखता हुआ गुजरा. अचानक मैंने आधी रात का ठहाका सुना. आवाज घुटी-घुटी थी, मानो सोये हुए लोगों को जगाना नहीं हो. हालाँकि हवा में वह आवाज अभी भी गूँज रही हैं. आधी रात का समय और आस पास कोई नहीं . एकाएक मुझे लगा कि हँसने वाला मैं ही हो सकता हूँ और एकाएक इस हँसी के मारे मैं अपने कमरे में वापस चला आया . एकाएक मैंने लैम्प की बत्ती उकसा कर तेज की .
पिछली खिड़की के शीशे से धक्-धक् की आवाज हुई जहाँ कीड़ों का दल बदहवासी में खुद को खिड़की के शीशे से टकरा रहा था। अभी-अभी उनमें से कुछ कीड़े खिड़की की दरार से अंदर घुस आये। जैसे ही वे अन्दर आये, वे लैम्प की चिमनी से टकराकर धक-पक कि आवाज करने लगे। एक तो चिमनी के उपरी हिस्से से लहराते हुए लैम्प की लौ पर जा गिरा और मुझे भ्रम हुआ कि यह लौ असली है या नहीं। दो या तीन कीड़े हाँफते हुए जाकर पेपर शेड पर बैठ गये। पेपर शेड अभी नया ही है, कल रात ही लगाया
था. झक्क सफेद कागज को लहरदार मोड़ कर बनाये नये इस शेड के एक कोने में छींटे मार कर खूनी-लाल गारडेनिया बनाया हुआ था।
जब खूनी-लाल रंग के गारडेनिया खिलेंगे तब छोटे गुलाबी फूलों के सपने की तरह ही खजूर के पेड़ भी अपनी टहनियों पर चमकीले पल्लव का सपना देखेंगे... और मैं फिर से आधी रात की हँसी सुनूँगा। मैं झटके से इन विचारों के श्रृंखलाभंग करता हूँ और पेपर शेड पर बैठे छोटे से हरे कीड़े की ओर देखता हूँ। सूरजमुखी के बीज की तरह उनका सिर बड़ा और पूँछ छोटी है। वे गेंहू के एक दाने से आधे आकार के हैं और वे सब के सब मोहक, भावपूर्ण हरे रंग के हैं।
मैं जम्हाई लेता हूँ, एक सिगरेट जलाता हूँ और लैम्प के आगे इन हरे और सूक्ष्म नायकों को मौन श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए धुँआ छोड़ता हूँ।
15 सितम्बर 1924
चित्तीदार पत्ती
लैम्प की रोशनी में सातुला (13वीं सदी के युवान साम्राज्य का मंगोल कवि) की कविताएँ पड़ते हुए उस किताब में दबी, एक सूखी मैपल की पत्ती मिली।
इसने मुझे पिछले साल के गुजरे पतझड़ की याद दिला दी। एक रात घना कोहरा था और ज्यादातर पेड़ों की पत्तियाँ झड़ चुकी थीं, जबकि मेरे बागीचे का एक मैपल गहरे लाल रंग का हो गया था। मैंने पेड़ का चक्कर लगाया ताकि उन पत्तियों को अच्छी तरह देख सकूँ, जिन्हें मैं उस वक्त नहीं देख पाया था जब वे हरी थीं। सारी की सारी पत्तियाँ लाल नहीं हुई थीं, बल्कि अधिकतर हल्के बैंगनी रंग की थीं और कुछ पर तो अभी भी गाढ़े लाल रंग की पृष्ठभूमि पर गहरे हरे रंग के धब्बे थे। उनमें से एक पत्ती ऐसी थी
जिसमें किसी कीड़े ने छेद बना दिया था और ऐसा लगता था जैसे रंगबिरंगे लाल, पीले और हरे धब्बों के बीच काली किनारी वाली छेद से वह पत्ती आपको अपनी चमकीली आँखों से घूर रही हो।
“यह पत्ती चित्तीदार हो गयी है।” मैंने सोचा।
इसीलिए मैंने उसे तोड़कर उस किताब के भीतर रख दिया, जिसे उसी दिन खरीदी थी। मेरे ख्याल से मुझे उम्मीद थी कि टूट कर गिरने से पहले ही मैंने उसकी चित्तीदार बहुरंगी छटा को कुछ समय के लिए सुरक्षित रख लिया था, जिससे वह बाकी पत्तियों के साथ ही डाली से बिछड़ कर उड़ती हुई दूर न चली जाय। लेकिन आज की रात यह पीली और चिकनी होकर मेरी निगाहों के आगे पड़ी है, इसकी आँखों में पिछले साल जैसी चमक नहीं है. कुछ और साल बीतने पर, जब इसके पहलेवाले रंग मेरी यादों से मिट जाते तो शायद मैं यह भी भूल जाता कि मैंने इसे किताब में क्यों रखी थी। ऐसा लगता है कि चित्तीदार पत्तियाँ जो झड़ने-झड़ने को हों, उनकी रंग-बिरंगी आभा, हमारी देख-रेख में सिर्फ कुछ ही समय तक टिकी रह सकती है, हरियाली कायम रखने की तो बात ही छोड़िये।
मैं अपनी खिड़की से देख रहा हूँ कि जिन पेड़ों ने जाड़े को अच्छी तरह झेल लिया है वे अब तक अपनी पत्तियाँ गँवा कर नंगे हो चुके हैं, यही हाल मैपल का भी है। इस साल पतझड़ के अंत में भी शायद पिछले साल की तरह ही चित्तीदार पत्तियाँ रही होंगी, लेकिन अफसोस की बात यह कि इस साल पतझड़ की रंगत का मजा लेने के लिए मेरे पास समय नहीं था। 26 दिसम्बर 1925.
(यात्रा-7 से)
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