शनिवार, 18 जुलाई 2020

महेश अश्क की गजलें

एक/

गर सफर में निकल नहीं आते
हम जहाँ थे वहीं प’ रह जाते।
आहटें थीं, गुजर गईं छू के
ख्वाब होते तो आँख में आते।
हम ही खुद अपनी हद बनाते हैं
और उससे निकल नहीं पाते।
रास्ता था, तो धूल भी उड़ती
हम नहीं आते, दूसरे आते।
आप तो कह के बढ़ गए आगे
रह गए हम समझते-समझाते।
हम थे इक फासले प’ सूरज से
साथ होते तो डूब ही जाते।
इनकी-उनकी तो सुनते फिरते हैं
काश! हम अपनी कुछ खबर पाते...।

दो/

नहीं था, तो यही पैसा नहीं था
नहीं तो आदमी में क्या नहीं था।
परिंदों के परों भर आस्मां से
मेरा सपना अधिक ऊँचा नहीं था।
यहाँ हर चीज वह हे, जो नहीं हे
कभी पहले भी ऐसा था-? नहीं था।
हसद से धूप काली थी तो क्यों थी
दिया सूरज से तो जलता नहीं था।
पर इम्कां के झुलसते जा रहे थे
कहीं भी दूर तक साया नहीं था।
हुआ यह था कि उग आया था हम में
मगर जंगल अभी बदला नहीं था।
जमीनों-आस्मां की वुस्अर्तों में-
अटाए से भी मैं अटता नहीं था।
हमारे बीच चाहे और जो था
मगर इतना तो सन्नाटा नहीं था।
मुझे सब चाहते थे सस्ते-दामों
मुझे बिकने का फन आता नहीं था।

तीन/

मस्खरे तलवार लेकर आ गए
हम हँसे ही थे कि धोखा खा गए।
आस्मां आँखों को कुछ छोटा पड़ा
सारे मौसम मुट्ठियों में आ गए।
हादसे होते नहीं अब शहर में
यह खबर हमने सुनी, घबरा गए।
तुमको भी लगता हो शायद अब यही
सच वही था, जिससे तुम कतरा गए।
कुठ घरौंदे-सा उगा फिर रेत पर
और हम बच्चों-सा जिद पर आ गए।
रह गई खुलने से यकसर खामोशी
शब्द तो कुछ अर्थ अपना पा गए।
जिंदगी कुछ कम नहीं, ज्यादा नहीं
बस यही अंदाज हमको भा गए।
सच को सच की तर्ह जीने की थी धुन
हम सिला अपने किए का पा गए।
अब कहाँ ले जाएगी ऐ जिंदगी
घर से हम बाजार तक तो आ गए।

चार/

खिलौने तोड़ते, पर तितलियों के नोचते बच्चे
यही कल हो तो कल से कोई उम्मीद क्या रखे।
अचानक ठहर जाती है हवा गुम-गुम-सी होकर और
खटक जाते हैं जंगल को हरापन ओढ़ते पत्ते।
बना जाता है बॉबी दीमकों पेड़ ही सारा
मगर भालू को आते हैं नजर बस शहद के छत्ते।
हिरन को सुनके पंचायत ये इक आवाज में बोली
जिसे जंगल में रहना है, भरोसा शेर पर रखे।
क़सीदे हाकिमों के हों कि मलिका के, क़सीदे हैं
असद साहेब भी क्या-क्या सोच के पहुँचे थे कलकत्ते।

पांच/

तमाशा आँख को भाता बहुत है
मगर यह खून रुलवाता बहुत है।
अजब इक शै थी वो भी जेरे दामन
कि दिल सोचो तो पछताता बहुत है।
किसी की जंग उसे लड़नी नहीं है
मगर तलवार चमकाता बहुत है।
अगर दिल से कहूँ भी कुछ कभी मैं
समझता कम है समझाता बहुत है।
अजब है होशियारी का भी नश्शा
मजा आए तो फिर आता बहुत है।
हसद की आग अगर कुछ बुझ भी जाए
धुआँ सीने में रह जाता बहुत है।
हमारे दुख में तो इस, बात भी थी
तुम्हारे सुख में सन्नाटा बहुत है।

छः/

बिजलियां, लपटें, आशियां और हम
हर तरफ़ फैलता धुआं और हम।
बोने को सौ हरे-भरे मौसम
काटने को उदासियां और हम।
ज़िंदगी ठंडे चूल्हे-चौके सी
दांव देती कमाइयां और हम।
झाडिय़ां झुटपुटे के अफ़साने
खून के छींटे चूडिय़ां और हम।
पांव के नीचे से खिसकती ज़मीं
पंख, परवाज़, आस्मां और हम।
चेहरा-चेहरा जुलूस अपना-सा
दूर तक खाली मुट्ठियां और हम।
लफ़्ज़ हक और लफ़्ज़ का मोहताज
अपने रंग में रंगी ज़ुबां और हम।
रात-दिन, रात-दिन की फोटो-प्रति
काग़जी फूल तितलियां और हम।
होंठ कुछ कहते आंख कुछ बुनती
एक खामोशी दरमियां और हम।
आइने आपकी तरह के सब
अक्स-दर-अक्स किर्चियां और हम।
चीलें मंडराती आस्मानों पर
घर का घर ओढ़े चुप्पियां और हम।

सात/

दिन गुज़रता ये गिरता-पड़ता हुआ
दुख मुझे और मैं दुख को गढ़ता हुआ।
हर पकड़ छूटती पकड़ की तरह
गर्दनों पर दबाव बढ़ता हुआ।
आंख घिरती हुई अंधेरों से
हाथ जैसे चिराग़ गढ़ता हुआ।
खुद से मैं छूटता हुआ पीछे
रौंद कर खुद को आगे बढ़ता हुआ।
भूरा पड़ता एकेक हरा लमहा
सीना-सीना शिग़ाफ़ पड़ता हुआ।     (शिग़ाफ़- दरार)
शब्द शीशा सिफ़त चटखते हुए
अर्थ पारे की तर्ह चढ़ता हुआ।
सोच मिट्टी में इक उतरती हुई
मूड मौसम का कुछ बिगड़ता हुआ।
आदमी बनती-मिटती रेखाएं
और तोता नसीब पढ़ता हुआ।
क्या करूं मैं ये ठहरा - कुछ लेकर
कुछ से, कुछ तो कहीं हो कढ़ता हुआ।

आठ/

तुझ में तुझ से अलग जो है पलता
काश तुझको भी कुछ कभी खलता।
आंख, वो सब पकड़ नहीं पाती
होंठ और कान में जो है चलता।
इतनी परछाइयों में रहते हो
तुम कहां हो पता नहीं चलता।
मैं बताता कि रात का क्या हो
मेरे कहने से दिन अगर ढलता।
हम भी होते हैं अपनी बातों में
काम लफ़्ज़ों ही से नहीं चलता।
तुम अंधेरों को अपने देखो तो
कुछ कहीं है चिराग़-सा जलता।
जो न होना था वो हुआ आखि़र
आदमी हाथ रह गया मलता...।

नौ/

आप कहते हैं जो है पैसा है
हम नहीं मानते सब ऐसा है।
हम तो बाज़ार तक गये भी नहीं
घर में यह मोल-भाव कैसा है।
रात एहसास खुलते ज़ख्मों का
दिन बदन टूटने के ऐसा है।
कुछ के होने का कुछ जबाव नहीं
कुछ का होना सवाल जैसा है।
क्यों कथा अपनी लिख के हो रुसवा
अपना दुख कोई ऐसा-वैसा है।
आपको तो विदेश भी घर-सा
हमको घर भी विदेश जैसा है।
तुमने दिल दे ही मारा पत्थर पर
यह तो जैसे को ठीक तैसा है।

दस/

न मेरा जिस्म कहीं औ’ न मेरी जाँ रख दे
मेरा पसीना जहाँ है, मुझे वहाँ रख दे।
बगूला बन के भटकता फिरूँगा मैं कब तक
यक़ीन रख कि न रख, मुझमे कुछ गुमाँ रख दे।
बिदक भी जाते हैं, कुछ लोग भिड़ भी जाते हैं
प’ इसके डर से, कोई आईना कहाँ रख दे।
वो रात है, कि अगर आदमी के बस में हो
चिराग़ दिल को करे और मकाँ-मकाँ रख दे।
जो अनकहा है अभी तक, वो कहके देखा जाए
ख़मोशियों के दहन में, कोई ज़ुबाँ रख दे।

ग्यारह/

अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं
हम जितना होते हैं अक्सर, उससे भी घट जाते हैं।
तुम्हें तो अपनी धुन रहती है, सफ़र-सफ़र, मंज़िल-मंज़िल
हम रस्ते के पेड़ हैं लेकिन, धूल में हम अट जाते हैं।
लोगों की पहचान तो आख़रि, लोगों से ही होती है
कहाँ किसी के साथ किसी के बाज़ू-चौखट जाते हैं।
हम में क्या-क्या पठार हैं, परबत हैं और खाई है
मगर अचानक होता है कुछ और यह सब घट जाते हैं।
अपने-अपने हथियारों की दिशा तो कर ली जाए ठीक
वरना वार कहीं होता है, लोग कहीं कट जाते हैं।

बारह/

यहीं एक प्यास थी, जो खो गई है
नदी यह सुन के पागल हो गई है।
जो हरदम घर को घर रखती थी मुझमें
वो आँख अब शहर जैसी हो गई है।
हवा गुज़री तो है जेहनों से लेकिन
जहाँ चाहा है आँधी बो गई है।
दिया किस ताक़ में है, यह न सोचो
कहीं तो रोशनी कुछ खो गई है।








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