- सर्वत जमाल
सदियों पहले जब गज़लों ने भारत में क़दम रखे तब ईरान से चली इस इस विधा की भाषा फारसी थी और परिभाषा थी- ’महबूब से बातचीत।’ उन दिनों हिन्दुस्तानी भाषा (हिन्दी/उर्दू) में जिन लोगों ने ग़ज़लें कहने की कोशिश की, उन्हें जाहिल, गंवार तक कहा गया। कारण था, गज़लों का फ़ारसी भाषा में न होना। उस ज़माने आम तौर पर शहंशाह, नवाब, ज़मींदार और ऊंचे तबक़े के, पढ़े-लिखे लोग ही शायरी करते थे। उन लोगों ने यह ग्रंथि पाली थी कि ग़ज़ल सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़ारसी में ही होगी। ग़ज़ल का मज़मून भी महबूब -इश्क-मुहब्बत-शराब तक ही सीमित था।
लेकिन धीरे धीरे ग़ज़ल ने अपने पांव पसारने शुरू किए। ग़ज़ल उर्दू भाषा में हिन्दुस्तानी अवाम के दिलो-दिमाग़ पर राज कने लगी। फिर भी ग़ज़ल के (परंपरागत) विषय से हटने की जुर्रत किसी भी शायर ने नहीं दिखाई।
तीन सदी पहले का ज़माना हुआ, हैदराबाद दकन पढ़े-लिखे लोगों की बस्ती थी, शायरी की धूम थी। ऐसे वक़्त में ’वली’ ’ दकनी का यह शेर(मतला) अवाम की ज़बान पर चढ़ गयाः
“मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का एतबार खोती है।“
उस दौर में यह गज़ल का विषय था ही नहीं। बहुतों ने नाक-भौं चढ़ाई। मगर जिस शेर को अवाम ने सर चढ़ा लिया हो, उससे निगाहें फेरना भी मुमकिन नहीं था। बाद के दिनों में मीर, सौदा, इंशा, हाली , मोमिन वग़ैरह ने तो वली दकनी के शेर की रोशनी को और ज़िन्दगी बख़्शी। मिर्ज़ा ग़ालिब ने तो ग़ज़लों को एक नया और अनूठा लहजा तक दे डाला। इक़बाल, फ़ैज़, जोश, फ़िराक़, साहिर ने ग़ालिब की परम्परा को आगे, बहुत आगे पहुँचा दिया। लगभग चार सौ सालों से ग़ज़ल भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से में लोगों के दिलों पर राज कर रही है और अभी दूए-दूर तक इसकी लोकप्रियता कम होने के आसार भी नज़र नहीं आते।
हिन्दी साहित्य की महान विभूति पंडित सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने ग़ज़लों की हिन्दी में शुरूआत की। बात आई गयी हो गयी (कबीर तथा उनके समकालीन कई रचनाकारों ने भी ग़ज़लें कहने की कोशिशें की हैं)। लेकिन...हिन्दी ग़ज़लों का चलन शुरू हो गया। बात फिर भी नहीं बन रही थी। उर्दू ग़ज़लें - हिन्दी ग़ज़लों पर २१ नहीं, २८-३० पड़ रही थीं। हिन्दी ग़ज़लकार भी दोषी करार दिए जायेंगे कि उन्होंने ग़ज़लों पर मेहनत नहीं की बल्कि हिन्दी के क्लिष्ट शब्दों को जबरन ठूंसने जैसी हरकतें ज़ियादा कीं। फिर... दुष्यंत कुमार का आगमन हुआ. छोटी सी उम्र में एक नन्हा सा ग़ज़ल संग्रह ’साए में धूप’ क्या आया, हिन्दी ग़ज़लों की धूम मच गयी. पानी पी पी कर कोसने वाले कुछ उर्दू के शायरों तक ने दुष्यंत और हिन्दी ग़ज़ल का लहजा अपनाया. यही सिलसिला जारी है और मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि दुष्यंत ने साए में धूप से जिस सफ़र की शुरूअत की थी, बाद के रचनाकारों ने उसे मन्ज़िल के काफ़ी क़रीब पहुंचा दिया.
हिन्दी ग़ज़लों की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि बहुत से प्रख्यात गीतकार, कथाकार, निबंधकार यहाँ तक की कविता (अतुकांत) के लोग भी इस विधा से जोर आज़माइश करते नज़र आए । मुझे कुछ या किसी का भी नाम लेने, बताने की ज़रूरत नहीं, हक़ीक़त यह है कि गीतों/कहानियों/निबंधों और अख़बारों में ख़बरें लिख कर अपनी लेखनी का लोहा मनवा लेने वाले रचनाकार, ग़ज़ल के मोह में फंस कर, बुरी तरह धराशायी हुए। उनका यह ग़ज़ल प्रेम, ग़ज़ल की भाषा में कुछ ऐसा ही थाः
“ख़रीदेंअब चलो रुस्वाइयां भी
चलो उसकी गली भी देख आयें “
दरअस्ल ग़ज़ल ने जब महबूब का दामन छोड़ कर, आम आदमी के सरोकारों से नाता जोड़ा, फ़ारसी या गाढ़ी वाली उर्दू की आग़ोश से निकल कर, आम बोलचाल की भाषा के पहलू में बैठी तो यह ख़ास ही नहीं, आम की भी चहेती बन गयी। सिर्फ़ दो मिसरों में एक पूरी कहानी समो लेना, ग़ज़ल का ऐसा हुनर है, जिसने पाठकों/श्रोताओं के साथ क़लमकारों को भी अपने आकर्षण से जकड़ लिया। एक बाढ़ सी आई हुई है ग़ज़लों और ग़ज़लकारों की। ग़ज़लों को सामंती व्यवस्था का पैरोकार, नशा पिलाने वाली, कोठे वाली कह रही पत्रिकाओं ने भी ग़ज़ल विशेषांक प्रकाशित किए। बहुत से लोगों ने तो ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित कराने-कराने का धंधा ही खड़ा कर लिया है
लेकिन ग़ज़लकारों के इस सैलाब में कामयाब कितने हैं? ग़ज़ल की शास्त्रीयता, उसके नियम, क़ायदे-क़ानून को जाने-समझे बग़ैर लोगों ने लिखना शुरू कर दिया और अवाम ने उन्हें नकारना। परन्तु गज़लकारों ने हौसला नहीं छोड़ा। एक बड़ी तादाद ने इसका भी हल ढूंढ लिया। वे छाती ठोंककर कहते हैं -“ये हिन्दी ग़ज़ल है, ये ऐसी ही होती है।“
सवाल यह है कि अगर यह’ ऐसी ही होती है’ तो दुष्यंत कुमार की ऐसी क्यों नहीं हैं? तुफ़ैल चतुर्वेदी, महेश अश्क, सुलतान अहमद, इब्राहीम अश्क, अदम गोंडवी,ज्ञान प्रकाश विवेक, विज्ञान व्रत,देवेन्द्र आर्य, अंसार क़म्बरी राजेंद्र तिवारी, शेरजंग गर्ग और इस ’नाचीज़’ की ऐसी क्यों नहीं? क्या वो तमाम ग़ज़लगो, जो ग़ज़लों को मीटर (बहरों) की बंदिश में रखते हुए भी,कथ्य को शेरो की शक्ल देने में कामयाब हैं, हिन्दी ग़ज़लें नहीं कह रहे हैं? अगर हिन्दी ग़ज़लों का अर्थ अशुद्धियाँ-त्रुटियां ही हैं तो उन रचनाकारों को चाहिए कि वे दुष्यंत को भी हिन्दी ग़ज़ल के ख़ैमे से ख़ारिज कर दें।
ग़ज़लें लगभग ४०० साल से भारत में लोकप्रिय हैं। पिछले ३०-३५ वर्षों से हिन्दी ग़ज़ल के नाम पर कुछ लोगों द्वारा जो परोसा जा रहा है, भारतीय जनमानस उसे लगातार नकारता आ रहा है। अगर चार सदियों में, शायरों ने ग़ज़ल के क़ायदे-क़ानून सीख कर ही शायरी की है तो ये बाक़ी लोग सीखने से गुरेज़ क्यों रखते हैं? क्या भारतीय चुनाव व्यवस्था की तरह ’इतने सरे बुरे लोगों में से कम बुरे को नें’ की तर्ज़ पर ये लोग अपनी ग़ज़लें भी परवान चढ़ाना चाहते हैं? ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने दें। न लिख सकें तो कविता की कई विधाएं हैं, उन में क़लम आज़मायें। ग़ज़ल ही लिखने के लिए किसी डाक्टर ने मशवरा दिया है क्या?
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बढ़िया सर
जवाब देंहटाएंजमाल साहब ने हिन्दी ग़ज़ल की बात करते हुए आज लिखी जा रही हिन्दी ग़ज़ल को कटघरे में खड़ा करते हुए जो आपत्तियां उठाई है उसे एकदम से दरकिनार नहीं किया जा सकता। ग़ज़ल के मुतल्लिक एक शेर में अपनी बात कहना चाहूंगा---_--
जवाब देंहटाएंग़ज़ल तहज़ीब है इक फ़न है एक मेयार है इसका।
ग़ज़ल के शेर कहने में कलेजा मुंह को आता है।
जैसा जमाल भाई ने कहा है और सही कहा है कि दुष्यंत कुमार के बाद हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वालों की इक भीड़ ही उमड़ पड़ी। जिसे देखिए वही ग़ज़ल लिख रहा है भले ही वह आज की गद्य शैली में कविता क्यों न लिख रहा हो। हिन्दी वालों ने इसे भी फैशन के तौर पर अपना लिया बिना इस बात पर ध्यान दिए कि यह एक छांदसिक विधा है जिसके अपने नियम हैं,व्याकरण हैं। ग़ज़ल एक खास तरह का फ़न है। ग़ज़ल एक मिज़ाज है और मिज़ाज यूं ही नहीं बना करते। इसके लिए एक पूरी प्रक्रिया से हो कर गुज़रना पड़ता है। बहुत पहले मीर साहब ने इस बात की ओर इशारा करते हुए कहा था, " ग़ज़ल कहनी न आती थी तो सौ सौ शेर आते थे/ मगर ऐ मीर अब इक शेर भी मुश्किल से बनता है/" लेकिन हिन्दी वालों ने हड़बड़ी में मीर की इस बात पर ध्यान नहीं दिया। ग़ज़लें लिखने लगे। परिणाम यह हुआ कि आज लिखी जा रही हिन्दी ग़ज़लों का एक बड़ा हिस्सा ग़ज़ल के फार्मेट में तो है लेकिन मुकम्मिल तौर पर उसे ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता। ग़ज़ल उर्दू में एक तहज़ीब है जबकि हिन्दी में अभी भी यह केवल एक काव्य रूप भर है। उर्दू में आज भी उस्ताद शागिर्द की परंपरा है, हिन्दी में ऐसा कुछ भी नहीं है। इसकी खूबियों खामियों को जानने वाले आलोचक उर्दू भाषा में तो हैं लेकिन हिन्दी में नहीं। हैं भी तो उस तरह के नहीं जैसे उर्दू में। हिन्दी में ग़ज़ल की जिस कमी की ओर जमाल साहब ने इशारा किया है उसकी ये भी बड़ी वजहें हैं। बावजूद इसके हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वाले अच्छे ग़ज़लकारों की कमी नहीं। इनकी संख्या हजारों में भले न हो मगर सैकड़ों में तो है अवश्य।
कल्पना, अनुभूति और चिंतन की त्रिवेणी ग़ज़ल एक विशिष्ट प्रकार की कलात्मक विधा है जिसमें शिल्प के स्तर पर किसी तरह की छूट संभव नहीं। कहते हैं कि ग़ालिब का अंदाजेबयां और के चचा गालिब ने कहा है कि, सिर्फ क़ाफिया या ज़ुबानदानी ही शायरी नहीं है। इस बात पर भी हमें गौर करना होगा।आप ग़ज़ल उर्दू में कहें या हिन्दी में लिखें, ग़ज़ल की शर्तों पर खरा उतरना होगा।
जहां तक बात हिन्दी उर्दू ग़ज़ल की है,एक बात कहना चाहूंगा,हर भाषा की अलग प्रकृति होती है, हिन्दी की प्रकृति के अनुसार इस दिशा में हमें सोचना होगा।
ग़ज़ल की सबसे बड़ी खूबी मुझे लगती है वह यह कि इसका मिज़ाज डेमोक्रेटिक है, शब्दों के लिए कोई भाषायी बंधन नहीं। इसने हिन्दी और उर्दू के बीच दीवार जैसी स्थिति को तोड़ा है। ग़ज़ल के माध्यम से दोनों ही भाषाओं के रचनाकार एक मंच पर आए। दोनों ही भाषा के रचनाकारों ने एक दूसरे से कुछ न कुछ लिया या दिया है।
इस तरह हिन्दी ग़ज़ल अपने विकास की ओर अग्रसर है।
जाम,साकी, मीना, पैमाना की हदों से बाहर आज की ग़ज़ल आम आदमी की जिन्दगी उसके दुःख दर्द का दस्तावेज बन कर हमारे सामने उपस्थित हैं।
कल तलक जो बात साकी जाम तक सीमित रही।
"धीर" उसने रूप बदले ये नया तेवर तो देख।।
हिन्दी ग़ज़ल सिर्फ उर्दू ग़ज़ल का अनुकरण बन कर न रह जाए,इस पर हमें ध्यान देना होगा।
जितेन्द्र धीर
8961272416
द्रष्टव्य: ग़ज़ल एक मिज़ाज है तथा हिन्दी ग़ज़ल कुछ किंतु परन्तु शीर्षक से दो आलेख पूर्व प्रकाशित हैं।
जितेंद्र धीर जी, इस विस्तृत टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आपका पांडेय जी। इस ब्लाग पोस्ट के हवाले से हिन्दी ग़ज़ल के बारे में मुझे अपनी बात कहने का अवसर दिया।
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